तेरी अठखेलियों में, तेरी चुहलबाजी में, तेरी पहेलियों में इक अदा निराली है, मगर अफ़सोस तेरा वास्ता ऐसों से है, पहेलियाँ जिनके सर से गुजरने वाली हैं. हमसे आ पूछो कभी..'अगर मेरे बस में होता... हम होते, तुम होते, आगोश में आलम होता, मस्तियाँ भरता यों के थिरक उठती ये फिजा, झूमता चूमता जुल्फों को ये हर पल होता.
आ के अब वादियाँ बुलाती हैं, मैं तुझे ले के कहीं दूर .... माफ़ करना ये कितनी दूर निकल आया हूँ ख्यालों में, सफ़र ऐसा भी कभी कितना मज़ा देता है. जैसे रग-रग में कोई नशा-सा भर देता है.......
कोई भी ज़ख्म... गुनाह ज़िन्दगी से बड़ा नहीं, दिल बड़ा करके अपनों को बुला लो यारों. प्यार जिनसे है खता मुआफ उनकी कर भी दो, प्यार से दूर होने की सजा खुद को ना दो यारों.
खबर आयी है ... छप्पर अचानक फंट गया यारो, के बिन बादल अचानक खूब मेहर बरसी है यारों, गिला कैसा कि फिर बंटी पंचों को सौगात है यारों. जितनी झोली थी मिली उतनी ही सौगात है यारों. खुदा का शुक्रिया कर दो अदा, कुछ जश्न हो जाए, सुरूर छा जाये फिजा पर... हवा में जाम लहरायें.
हर साल योजनाओं के नाम पर सरकार द्वारा आबंटित धन का कितना बड़ा हिस्सा अनुपयोगी रह जाता है और कितना दुरुपयोग का शिकार हो जाता है यह देखने की सरकारें जहमत नहीं उठाती और विदेशों से ऋण लेती हैं..... योजनाओं के लिए स्वीकृत धनराशी घोषित लक्ष्य के अनुरूप हो रही है या नहीं ..... वे यह देखने की जहमत नहीं उठाती. योजनायें बनाना ही काफी नहीं है... उन पर अमल की प्रक्रिया भी हर स्तर पर पारदर्शी, लक्ष्यबद्ध और जवाबदेही से पूर्ण होनी चाहिए.